आखिर क्या दिक्कत है इस विज्ञापन में,जो सोशल मीडिया पर कुछ लोग इसके बॉयकाट का अभियान चला रहे हैं

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सर्फ एक्सल का नया ऐड ''रंग लाए संग
सर्फ एक्सल का नया ऐड ''रंग लाए संग

कुछ छोटे-छोटे बच्चे होली खेल रहे हैं, और सड़क पर आते-जाते लोगों पर रंगों भरे गुब्बारे फेंक रहे हैं।एक ‘मुसलमान’ बच्चा नमाज पढ़ने जाना चाहता है।मगर रंगों से डरकर घर में दुबका हुआ है।एक ‘हिंदू’ बच्ची उसकी मदद करती है और साइकल से घूम-घूमकर सारे बच्चों के रंग अपने ऊपर खत्म करवा देती है। फिर उस ‘मुसलमान’ बच्चे को अपनी साइकल पर बिठाकर नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद छोड़ आती है।सफेद कुर्ता-पजामा पहने वो बच्चा मस्जिद की सीढ़ियां चढ़ता हुआ कहता है- नमाज पढ़कर आता हूं.
और वो बच्ची उसकी तरफ देखकर मुस्कुराते हुए कहती है- बाद में रंग पड़ेगा जिसके जवाब में वो बच्चा बड़ी मासूमियत से मुस्कुरा कर हामी भर देता है….बस इतना सा विज्ञापन है

आखिर क्या दिक्कत है इस विज्ञापन में,जो सोशल मीडिया पर कुछ लोग इसके बॉयकाट का अभियान चला रहे हैं। आप दो बच्चों की दोस्ती बर्दाश्त नहीं कर पा रहे, उनकी मासूमियत, उनकी मुस्कान बर्दाश्त नहीं कर पा रहे,क्यों? सिर्फ इसलिए क्योंकि आपका धर्म बीच में आ गया और आपकी बेहद कमजोर भावनाएं आहत हो गईं,दरअसल आप नफ़रत के आदी होते जा रहे हैं। इससे पहले भी सर्फ एक्सेल रमजान के लिए भी विज्ञापन बना चुका है.

सोचिए आप क्या थे और क्या बनते जा रहे हैं?

“सख्ती थोड़ी लाज़िम है पत्थर होना ठीक नहीं
हिंदू मुस्लिम ठीक है साहब कट्टर होना ठीक नहीं”

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