वोट करने से पहले इसे पढ़िए,बाहुबलियों को मत चुनिए,नफरत के खिलाफ वोट कीजिए।

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ये राजनीति है भैया, यहां नाम हो, फिर चाहे कैसे भी हो सकारात्मक हो या नाकारात्मक। नेता भी समझते हैं कि हमें उठना कैसे है,बढ़ना कैसे है, दिखाना क्या है और जताना क्या है। अब तो दौर ही चल चुका है, कि हमारे यहां का नेता दबंग है। जनता और नेता दोनों को इनके विकास से कोई मतलब नहीं है। बस इनको रहनुमा मान के फिदा हो जाते हैं, फिदा भी ऐसे कि विकास को ठेंगे पर रखके। ‘ठेंगा’ दंबग नेता के चुनाव चिन्ह पर दबा आते हैं और बना देते हैं….बाहुबली

अब सवाल ये है कि ये बाहुबली आते कहां से हैं?हमारी इस राजनीति को गंदा करने के लिए, तो इस सवाल के जवाब के लिए आपको थोड़ा पीछे जाकर समझना होगा, कि कैसे बाहुबलियों की राजनीति में एंट्री हुई और कब और क्यों राजनेताओं को दबंगों की जरूरत महसूस होने लगी थी?

दरअसल नेताओं को पोलिंग बूथ पर क़ब्ज़ा करने के लिए दबंगों की ज़रूरत थी और इस तरह राजनेता दबंगों पर आश्रित होने लगे और जब नेताओं की ये निर्भरता ज्यादा बढ़ने लगी तो यही दबंग ये सोचने लगे कि जब ये नेता हमारे दम पर ही चुनाव जीत रहे हैं तो क्यों न हम ही चुनाव लड़ें और इस तरह से राजनीति में खुले दबंगों के लिए दरवाजे…जो आज तक बंद होने का नाम नहीं ले रहे और अब यही दबंग चुनाव दर चुनाव जीत दर्ज कर बाहुबली बनकर हमें ही डराने का काम कर रहे हैं।

shahuddin

इन बाहुबलियों में कई नाम हैं, जो बेहद चर्चित हैं। चर्चित क्या दरअसल ये कुख्यात हैं….इनमें शहाबुद्दीन का नाम बेहद चर्चित है

शहाबुद्दीन पर हत्या, लूट ,अपहरण, समेत तमाम संगीन मामले चल रहे है.

कई मामलों में शहाबुद्दीन को सजा सुनाई जा चुकी है

1999,2004 में शहाबुद्दीन आरजेडी से लड़े और जीत भी दर्ज की

2009 में शहाबुद्दीन के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी

फिलहाल शहाबुद्दीन दो पत्रकारों की हत्या के मामले में सजा काट रहे है

atik ahmad

एक और बाहुबली हैं नाम है अतीक अहमद यूपी की राजनीति में बड़ा दबदबा रखते हैं

इनके खिलाफ 59 मामले दर्ज है जिनमें 80 गंभीर धाराएं शामिल हैं

विधायक से लेकर सांसद का का सफर तय कर चुके हैं अतीक अहमद

अपना दल से राजनीति शुरू की और समाजवादी पार्टी से विधायक और सांसद बने

एक और बाहुबली हैं नाम है रमाकांत यादव…

2009 में भाजपा के टिकट पर आजमगढ़ से सांसद चुने गए थे

2014 की मोदी लहर में भाजपा के प्रत्याशी थे लेकिन मुलायम सिंह यादव से चुनाव हार गए

रमांकात यादव पर 20 से ज्यादा अपाधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें हत्या, अपहरण शामिल हैं

रमाकांत यादव को बीजेपी से टिकट नहीं मिला, अब ये कांग्रेस के टिकट पर मैदान में हैं

ये तो वो कुछ चेहरे हैं जो अक्सर मीडिया में छाए रहते हैं…लेकिन कई ऐसे भी हैं। जो जिनकी चर्चा कम होती है…लेकिन अपने इलाके में दबदबा पूरा रखते हैं

दअसल राज्य या पार्टी से निर्वाचित जनप्रतिधिनिधियों की पृष्ठभूमि देखी जाए तो पता चलता है कि दागियों को अपना नाम और निशान देने में अब किसी को कोई परेशानी नहीं होती, फर्क बस संख्या को लेकर हो सकता है। जब भी चुनाव के नतीजे आते हैं तब राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि वालों के बढ़ते दबदबे का रिकॉर्ड हमारे सामने होता है। हमारा गुस्सा राजनीति और राजनीतिक पार्टियों पर उतरता है।

लेकिन फिर बड़ा सवाल  यही है कि ये नौबत आती क्यों है? इस सवाल के जवाब से पहले इस सच को स्वीकारना होगा कि पॉलिटिकल पार्टीज पावर में आने के लिए ही बनती हैं। अगर उनका ध्येय यह न हो तो फिर इतने दांव-पेंच की जरूरत ही नहीं। बहुमत, या यूं कहें कि सरकार बनाने के लिए जो जरूरी सांसदों और विधायकों का जादुई आंकड़ा होता है, उस पर ही पॉलिटिकल पार्टीज की नजर होती है। राजनीति से बाहुबलियों और दागियों की दखलअंदाजी को खत्म करने में वोटर निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। एक अच्छी बात यह भी दिख रही है कि राजनीतिक दलों में हिम्मत बढ़ रही है। वह दागी और बाहुबलियों से दूरी बनाते दिख रहे हैं। लेकिन मजबूरी ही उन्हें बार-बार उनके पास ले जाती है। ऐसे में मतदाताओं को अपने वोट के जरिये राजनीतिक दलों को ताकत देनी चाहिए।

यूपी में 2012 के विधानसभा चुनाव से पूर्व तक बाहुबली होना चुनाव में जीत की गारंटी मानी जाती थी लेकिन अब जनता इन्हें नकारने लगी है. 2012 के विधानसभा चुनाव में तमाम बाहुबलियों को हार का मुंह देखना पड़ा. हारने वालों में अतीक अहमद, बृजेश सिंह, अमरमणि के बेटे अमनमणि और धनजंय सिंह की पत्नी जागृति सिंह आदि नाम प्रमुख रहे. इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में धनंजय सिंह, अतीक अहमद, मित्रसेन यादव, डीपी यादव, रमाकांत यादव,जैसे बाहुबलियों को भी तमाम जोड़-जुगाड़ के बावदूज हार का मुंह देखने को मजबूर होना पड़ा था।

2017 के विधानसभा चुनाव में बाहुबलियों को टिकट नहीं देने का बड़ा कदम अखिलेश यादव ने उठाया था. मुख्तार अंसारी और उनके परिवार को सपा में शामिल करने का विरोध किया तो वहीं अतीक अहमद, विजय मिश्र, गुड्डू पंडित, अमनमणि का टिकट काट दिया था. अधिकांश बाहुबली छोटे दलों के टिकट पर चुनाव में उतरे और हारे. सिर्फ मुख्तार अंसारी ही विधायक बनने में सफल रहे. वहीं इस चुनाव में जो बाहुबली उतर रहे हैं उनकी जीत/हार ही उनका राजनीति में भविष्य तय करेगी.

नहीं मालूम कहां से और कैसे जनता के बीच ये बात स्थापित हो गई कि दंबग प्रत्याशी हमारे लिए फायदेमंद है। कई लोगों के मुंह से अक्सर ये सुना जाता है कि नेता जी बहुंत दबंग हैं, अधिकारियों को धमकाकर तुरंत काम करवा लेते हैं,और ये कहते हुए वे ये भूल जाते हैं कि जो आदमी अधिकारियों को धमका सकता है, वो अपनी जरूरत पर आपको पीट भी सकता है,और फिर आप कुछ नहीं कर पाएंगे। किसी से शिकायत नहीं कर पाएंगे…और पुलिस के पास तो आप जा ही नहीं सकते क्योंकि आपने उस दबंग को वोट देकर बाहुबली जो बना दिया है…इसलिए किसी दबंग को चुनकर मालिक बनाने से अच्छा है। किसी कमजोर को चुनकर सेवक बनाना जो पढ़ा लिखा हो, या समझदार हो,और वोट डालते समय नेताओं की बदजुबानी याद रखिए, कैमरे पर किसी को जूते मारने की धमकी देते चेहरे याद रखिए, नफरत के खिलाफ वोट करिए।

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