माफ कीजिए! ये फिल्म मनमोहन सिंह पर नहीं है

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अक्सर किताब का कवर देखकर उसके अंदर क्या लिखा है इसका अंदाजा हो ही जाता है। लेकिन कभी-कभी इसके बिल्कुल उलट भी हो जाता है।’एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ में भी ऐसा ही हुआ है। मनमोहन सिंह का नाम देकर संजय बारू ने अपने ऊपर पिक्चर बनवा ली है।पूरी फ़िल्म बारू के इर्द गिर्द घूमती है।मनमोहन सिंह साइड रोल में नज़र आते हैं।मनमोहन पर जितनी सोनिया नहीं, उससे ज्यादा बारू अपनी चलाते नज़र आते हैं।

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फ़िल्म के मुताबिक़ अगर बारू न होते तो मनमोहन अमेरिका से न्यूक्लिअर डील न कर पाते।

जब इस फिल्म का ट्रेलर आया था तब से मैं सोच रहा था कि इस फिल्म में सोनिया,राहुल,मनमोहन सिंह के नाम कैसे और क्यों लिए गए हैं? दरअसल इस फ़िल्म में सेंसर बोर्ड ने डिस्क्लेमर की परिभाषा ही बदल दी है।फ़िल्म के डिस्क्लेमर के विपरीत इसमें मनमोहन सिंह समेत कई नेताओं के असल शॉट्स का इस्तेमाल किया गया है।

बारू ने मनमोहन के ख़िलाफ़ तमाम ‘साज़िशों’ का ब्योरा दिया है। अपने ख़िलाफ़ की ‘साज़िशों’ का भी। पर सुविधानुसार ‘उस रिकार्डिंग’ का ज़िक्र नहीं किया जिसकी वजह से उनको हटाया गया।

फ़िल्म में कई बड़ी तकनीकी चूक भी हैं। यूपीए वन के दौरान सदन में हंगामा और मनमोहन को दस दिन तक न बोलने देने के समय स्पीकर की आवाज़ के तौर पर सुमित्रा महाजन की आवाज़ सुनाई देती है। जबकि उस समय स्पीकर सोमनाथ चैटर्जी थे। दूसरी सबसे बड़ी गलती राहुल गांधी को अध्यादेश फाड़ते हुए दिखाना है जबकि असल में राहुल गांधी ने कभी कोई अध्यादेश फाड़ा ही नहीं। वैसे जब इंटेंशनली कुछ लिखा या बनाया जाता है तो इस तरह की गलतियां हो ही जाती हैं।ये तो वो गलतियां थीं जो कोई भी पकड़ लेगा बाकि जिन्होंने संजय बारू की किताब पढ़ी होगी वे और ज्यादा झूठ पकड़ सकते हैं।

फिल्म में जो अच्छा है वो है कुछ लोगों का अभिनय, जैसे मनमोहन सिंह की पत्नी का किरदार निभाने वाली दिव्या सेठ शाह किरदार में एक दम फिट हैं। सोनिया गांधी का किरदार निभा रहीं टी सुजैन बर्नर्ट ने सोनिया गांधी के लहजे और एक्सप्रेशन को अच्छा निभाया है। प्रियंका और राहुल राहुल गांधी का रोल कर रहे अभिनेता-अभिनेत्री देखने में ठीक हैं।लेकिन उनका राहुल गांधी की मजाक बनाने के लिए ज्यादा इस्तेमाल हुआ है।

सबसे सुखद अटल बिहारी वाजपेयी को देखना लगता है जो सिर्फ मुस्कराते हैं और देखने वालों के चेहरे पर मुस्कराहट छोड़ जाते हैं।

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फ़िल्म के पात्रों की शक्लें नेताओं से मिलाने की पूरी कोशिश की गई है पर बारु के कैरेक्टर को पूरा फ़िल्मी हीरो रखा गया है जो अखरता है।

सभी किरदारों में सब फिट बैठते हैं।सिर्फ एक ही शख्स उस किरदार में फिट नहीं बैठ रहा था जो कि स्क्रीन पर संजय बारू की तरह दिख भी नहीं रहा था. वो थे अक्षय खन्ना। अब बात अनुपम खेर की जो, जिन्होंने मनमोहन सिंह की चाल ढाल, तौर-तरीके को अच्छे से पर्दे पर उतारा है।बस चलते हुए कभी-कभी अजीब लगने लगते हैं। फिल्म अच्छी बन सकती थी कई जगह अच्छी लगी भी है लेकिन अंत में पूरी तरह से प्रोपेगेंडा और एक पार्टी,एक परिवार को निशाना बनाने के लिए बनाई गई लगने लगती है जब फिल्म के आखिर में मोदी के भाषण की क्लिप चलाई जाती हैं,और शीला दीक्षित की वो क्लिप दिखाई जाती है जिसमें वे एक रैली से जाते हुए लोगों को रोकते हुए कहती हैं कि 10 मिनट और रुक जाइए राहुल गांधी आने वाले हैं।

किसी की मिमिक्री तब ही ज्यादा अच्छी लगती है जब आप उसके पूरे किरदार को ऑवजर्ब कर मिमिक्री करें नहीं तो वो वैसे ही लगने लगती है जैसे कुछ लोग शाहरूख खान को सिर्फ मैं,मैंऔर कि,कि किरन तक और शत्रुघ्न सिन्हा के खामोश तक ही सीमित हो जाते हैं’’

 

 

नोट: इस लेख को  SAURAV YADAV ने हमारे प्लेटफॉर्म पर लिखा है और पेशे से ये एक  Journalist हैं।  यदि आप भी कुछ लिखना चाहते हैं तो फेसबुक  पेज पर मैसेज में या contact@bcmedia.in पर हमें मेल भेज सकते हैं।

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