अलीगढ़ की मासूम ट्वींकल की आरोपियों के नाम चिट्ठी आई है, हिम्मत हो तो पढ़ लीजिए !

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अलीगढ़ की ढाई साल की मासूम ट्वींकल ये बेरहम दुनिया छोड़कर जा चुकी है, लेकिन अपने पीछे कई सवाल छोड़ गई है जिनके जवाब अगर हम तलाश कर सके तो शायद आने वाली पीढ़ियों का सामना कर पाएंगे, उस मासूम के मन में उस समय क्या रहा होगा, वो उन दरिंदों से क्या कहना चाह रही होगी…एक बार सुनिए वो खत जो उसने कभी लिखा नहीं लेकिन अगर जिंदा रहती तो लिखती जरूर…

twinklesharma aligarh bcmedia

सुनो अंकल… अभी सिर्फ ढाई साल की थी मैं , कुछ महीने बाद मैं अपनी जिदंगी का तीसरा जन्मदिन मना रही होती अगर आप दोनों ने मुझे जिंदा रहने दिया होता लेकिन आपने मेरी जान ले ली.महज कुछ हजार रूपये के लिए आप शायद भूल गए कि मुझे तो उन नोटों का रंग भी नहीं पता जिनके लिए आपने मेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए,मेरी सारी पसलियां तोड़ दीं, बायां पैर तोड़ दिया, दायां हाथ कंधे से काट दिया,आंख तक फोड़ दी,किस लिए? महज कुछ हजार रुपये के लिए? मेरे छोटे हाथों को काटते वक्त तरस नहीं आया आपको? लेकिन याद रखना, मेरी आंखें जो आपने फोड़ दीं वो आपका पीछा कभी नहीं छोड़ेंगी। पता नहीं मुझ जैसी बच्चों को मारने का कलेजा आप जैसे हैवानों में कहां से आता होगा? फांसी क्या होती, मैं ये भी नहीं जानती लेकिन लोगों से सुना है कि ये सजा उन लोगों को दी जाती है जो इंसानों की दुनिया में हैवान बने घूमते हैं. मुझे ये भी पता है कि आपको सजा मिलने से मैं लौटकर नहीं आऊंगी लेकिन हम इंसानों की इस दुनियां में आप जैसे हैवानों को रहने का कोई हक भी नहीं है। आप जैसे लोग हमारे समाज में रहेंगे तो हम जैसी बच्चियां हमेशा डर के साए में जीने को मजूबर होती रहेंगी और हमारे मां-बाप हमेशा फिक्रमंद रहेंगे. मैं जा रही हूं और इस उम्मीद से जा रही हूं कि अब जब मैं कभी लौटूं तो ये दुनिया कुछ रहने लायक बने, इस समाज में हैवानों की जगह अच्छे इंसानों का बसेरा हो और अगर आप जैसे हैवान हों भी तो कुछ अलग शक्ल लिए हुए हों. जिससे हम जैसे छोटे बच्चों को आप जैसे हैवानों को पहचानने में मुश्किल ना हो……..

इस बार के लिए अलविदा…..

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